Maharastra News: महाराष्ट्र की राजनीति में सोमवार को अचानक हलचल तेज हो गई, जब खेल मंत्री माणिकराव कोकाटे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। एनसीपी के अजित पवार गुट से जुड़े कोकाटे का जाना महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि बीते तीन दशक पुराने एक मामले की कानूनी परिणति के तौर पर देखा जा रहा है। नासिक की अदालत से सजा बरकरार रहने के बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़ने का फैसला लिया, जिसने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर जवाबदेही और नैतिकता की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया।

कोकाटे के इस्तीफे के तुरंत बाद उपमुख्यमंत्री अजित पवार की प्रतिक्रिया सामने आई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत के फैसले के बाद कोकाटे ने स्वयं उन्हें अपना इस्तीफा सौंपा और पार्टी की मूल विचारधारा के अनुसार इसे सिद्धांततः स्वीकार कर लिया गया है। पवार ने यह भी संकेत दिया कि सरकार किसी भी स्थिति में कानून और संविधान से ऊपर किसी व्यक्ति को नहीं मानती।

अजित पवार ने कहा कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कोकाटे का इस्तीफा मुख्यमंत्री को आगे की स्वीकृति के लिए भेज दिया गया है। उनके मुताबिक, सार्वजनिक जीवन में रहने वालों के लिए न्यायपालिका का सम्मान और संवैधानिक नैतिकता सबसे अहम है। पवार ने यह भी दोहराया कि पार्टी कानून के शासन के साथ खड़ी है और ऐसे फैसले लोकतांत्रिक मूल्यों व जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं।

[caption id="attachment_210831" align="alignnone" width="1130"] खेल मंत्री माणिकराव कोकाटे का इस्तीफा[/caption]

पूरा मामला 1995 से जुड़ा है जब माणिकराव कोकाटे पर धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप लगे थे। निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए दो साल की जेल की सजा सुनाई थी। इस फैसले को उन्होंने नासिक सेशन कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली और सजा को बरकरार रखा गया। इसके बाद कानूनी दबाव और बढ़ गया।

[caption id="attachment_210832" align="alignnone" width="1091"] खेल मंत्री माणिकराव कोकाटे का इस्तीफा[/caption]

हाल के महीनों में यह मामला फिर से चर्चा में आया, जब एक जिला अदालत ने कोकाटे के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। 20 फरवरी 2025 को अदालत ने फर्जी दस्तावेज जमा करने के एक अन्य मामले में कोकाटे और उनके भाई विजय को भी दोषी ठहराया। दोनों को अलग-अलग मामलों में दो-दो साल की सजा सुनाई गई, जिसने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया।

मंत्री पद से इस्तीफे के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस खाली पद को कैसे भरती है और क्या यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में जवाबदेही की एक नई मिसाल बनेगा।