• भारत के रत्न और आभूषण निर्यात को 75 अरब डॉलर तक ले जाने के लिए मास्टर प्लान तैयार।
  • एक्जिम बैंक और GJEPC की रिपोर्ट में क्लस्टर-आधारित मॉडल पर जोर।
  • मुंबई, सूरत और जयपुर जैसे 17 जिलों की पहचान, जहाँ से बढ़ेगा दुनिया भर में निर्यात।
  • 38 अरब डॉलर की ऐसी क्षमता जो अब तक छिपी हुई थी, उसे उभारने की तैयारी।
भारत के रत्न और आभूषण उद्योग के लिए एक बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। गुरुवार को जारी हुई एक ताजा रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि अगर हम सही रणनीति और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, तो साल 2030 तक इस सेक्टर का निर्यात 75 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। यह रिपोर्ट भारतीय निर्यात-आयात बैंक (Exim Bank) और रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (GJEPC) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है। इस स्टडी की सबसे खास बात यह है कि इसमें 'क्लस्टर-फोकस्ड' अप्रोच की वकालत की गई है। यानी सरकार और उद्योग जगत को उन चुनिंदा इलाकों पर अपनी पूरी ताकत झोंकनी होगी जहाँ इन रत्नों को तराशने और गहने बनाने का काम सदियों से हो रहा है।

इन 17 जिलों में छिपा है कामयाबी का राज

रिपोर्ट में देश के 17 ऐसे जिला-स्तरीय क्लस्टर्स की पहचान की गई है जिनमें निर्यात बढ़ाने की जबरदस्त संभावना है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि मुंबई उपनगर इस लिस्ट में सबसे ऊपर है। इसके अलावा सूरत, कोलकाता और जयपुर जैसे शहरों को 'फ्रंट रनर' यानी इस रेस में सबसे आगे रहने वाले शहरों के रूप में देखा जा रहा है। देखा जाए तो भारत के पास अभी भी 38 अरब डॉलर की ऐसी निर्यात क्षमता है जिसे हमने अब तक छुआ भी नहीं है। यह एक बड़ी रकम है जो देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है।

बदलना होगा काम करने का तरीका

एक्जिम बैंक की प्रबंध निदेशक हर्षा बंगारी ने इस मौके पर कहा कि यह सेक्टर न केवल हमारी जीडीपी के लिए जरूरी है, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार भी देता है। उन्होंने साफ किया कि यह स्टडी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि नीति निर्माताओं और उद्योग से जुड़े लोगों के लिए एक गाइड की तरह काम करेगी। दुनिया अब बदल रही है, और रिपोर्ट सुझाव देती है कि हमें भी अब सिर्फ पारंपरिक गहनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अब वक्त है डायमंड स्टडेड ज्वेलरी, हल्के वजन वाले सोने के गहने, लग्जरी स्मार्ट ज्वेलरी और लैब में बने सिंथेटिक रत्नों पर ध्यान देने का। यहाँ तक कि ज्योतिष से प्रेरित डिजाइनों की भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है।

नए बाजारों की तलाश और सरकारी मदद

भारतीय गहनों के लिए अब सिर्फ अमेरिका या मिडिल-ईस्ट पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा। रिपोर्ट में वियतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड और बोत्सवाना जैसे उभरते बाजारों में पैठ बनाने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही यूरोपीय संघ जैसे विकसित बाजारों में भी भारतीय कारीगरी का डंका बजाने की जरूरत है। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। रास्ते में कुछ रुकावटें भी हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि सीमा शुल्क (Customs) से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाना होगा। जयपुर, अहमदाबाद और राजकोट जैसे शहरों में जो बुनियादी कमियाँ हैं, उन्हें दूर करना होगा। इसके साथ ही राज्य सरकारों से अपील की गई है कि वे एसजीएसटी रिइम्बर्समेंट और कैपिटल सब्सिडी जैसी रियायतें दें। अगर हम अपने सेज (SEZ) इलाकों को और मजबूत करते हैं और डिजाइनिंग में नए इनोवेशन लाते हैं, तो भारत को दुनिया की 'ज्वेलरी फैक्ट्री' बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।