न्यू ईयर 2026 से पहले बड़ी हड़ताल: Swiggy–Zomato, Amazon–Flipkart के लाखों डिलीवरी पार्टनर करेंगे ऐप लॉग-ऑफ, ऑनलाइन ऑर्डर पर भारी असर

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Vews Ai Verified Media or Organization • 27 Feb, 2026 Editor
Dec 31, 2025 • 9:10 AM
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न्यू ईयर 2026 से पहले बड़ी हड़ताल: Swiggy–Zomato, Amazon–Flipkart के लाखों डिलीवरी पार्टनर करेंगे ऐप लॉग-ऑफ, ऑनलाइन ऑर्डर पर भारी असर
y–Zomato, Amazon–Flipkart के लाखों डिलीवरी पार्टनर करेंगे ऐप लॉग-ऑफ, ऑनलाइन ऑर्डर पर भारी असर
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न्यू ईयर 2026 से पहले बड़ी हड़ताल: Swiggy–Zomato, Amazon–Flipkart के लाखों डिलीवरी पार्टनर करेंगे ऐप लॉग-ऑफ, ऑनलाइन ऑर्डर पर भारी असर
  • स्विगी, जोमैटो, अमेजन, फ्लिपकार्ट के डिलीवरी वर्कर्स ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल
  • बड़े शहरों में ऑनलाइन ऑर्डर लेट या कैंसिल हो सकते हैं
  • ​1–1.5 लाख डिलीवरी पार्टनर के शामिल होने का दावा
  • ​वर्कर्स फेयर पे (fair pay), 10 मिनट डिलीवरी मॉडल खत्म करने की मांग
  • मनमाने आईडी ब्लॉक और पेनल्टी पर रोक की मांग
  • हेल्थ इंश्योरेंस और सोशल सिक्योरिटी (social security) जैसी सुविधाओं की मांग
नए साल 2026 की उलटी गिनती के बीच जब मॉल, रेस्टोरेंट और घरों में पार्टी प्लान फाइनल हो रहे हैं, उसी समय एक और तैयारी पर्दे के पीछे चल रही है – गिग वर्कर्स की राष्ट्रव्यापी हड़ताल। फूड डिलीवरी से लेकर क्विक कॉमर्स (quick commerce) और ई-कॉमर्स (e-commerce) तक, तमाम प्लेटफॉर्म से जुड़े डिलीवरी पार्टनर 31 दिसंबर को “ऐप से लॉग-ऑफ” (log-off) मोड में जाने की चेतावनी दे चुके हैं। ​ ​वर्कर्स का कहना है कि यह सिर्फ एक दिन की नाराज़गी नहीं बल्कि साल भर लगातार बिगड़ते हालात के खिलाफ मजबूरन उठाया गया कदम है।

किन प्लेटफॉर्म और शहरों पर सबसे ज़्यादा असर?

हड़ताल की कॉल स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसे बड़े प्लेटफॉर्म के डिलीवरी पार्टनर्स ने मिलकर दी है। ऑनलाइन ऑर्डर की सबसे अधिक डिपेंडेंसी माने जाने वाले इन ऐप्स पर न्यू ईयर ईव के दिन ऑर्डर कन्फर्म तो हो सकते हैं लेकिन डिलीवरी टाइमिंग (delivery timing) पर बड़ा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ​ तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) के नेतृत्व में यह आंदोलन दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु के साथ कई टियर-2 शहरों तक फैलने का दावा कर रहा है। यूनियन पदाधिकारी 1 से 1.5 लाख वर्कर्स के फ्लैश स्ट्राइक (flash strike) में शामिल होने की बात कह रहे हैं यानी पीक ऑवर (peak hour) में अचानक हज़ारों राइडर लॉग-ऑफ होकर सिस्टम से बाहर हो सकते हैं।

क्रिसमस से न्यू ईयर तक नाराज़गी क्यों उबल पड़ी?

क्रिसमस डे पर भी देशभर के कई शहरों में गिग वर्कर्स कुछ घंटों की हड़ताल कर चुके हैं, जिसके दौरान 40,000 से अधिक डिलीवरी पार्टनर्स के काम रोकने का अनुमान लगाया गया था। उस फ्लैश स्ट्राइक के बाद भी जब कंपनियों और सरकार की ओर से ठोस ऐक्शन नहीं दिखा तो न्यू ईयर ईव पर दोबारा लेकिन ज़्यादा संगठित तरीके से विरोध करने की रणनीति बनाई गई। ​ यूनियन नेताओं का आरोप है कि बीते दो–तीन साल में प्रति ऑर्डर कमाई (per order earning) लगातार घटी है, जबकि फ्यूल, मेंटेनेंस और इंश्योरेंस जैसे खर्च तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में त्योहारों और छुट्टियों के दौरान मिलने वाले तथाकथित इंसेंटिव (incentive) भी अब उनकी भरपाई नहीं कर पा रहे।

10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर सबसे बड़ा सवाल

डिलीवरी वर्कर्स की नाराज़गी का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है 10 मिनट डिलीवरी मॉडल। वर्कर्स का कहना है कि ग्राहक के लिए यह “सुविधा” है, लेकिन उनके लिए यह रोज़ की जानलेवा दौड़ में बदल गया है, जिसमें ट्रैफिक, मौसम और थकान की कोई कीमत नहीं रखी जाती। ​ ​यूनियन का आरोप है कि तेज़ डिलीवरी के नाम पर एल्गोरिदम (algorithm) और ऐप नोटिफिकेशन वर्कर्स पर ऐसा प्रेशर बनाते हैं कि वे लाल बत्ती, खराब मौसम और रात की कम विज़िबिलिटी (visibility) जैसे जोखिमों को नज़रअंदाज़ करने पर मजबूर हो जाते हैं। इसके बावजूद उनके पास न तो दुर्घटना बीमा (accident insurance) का भरोसेमंद कवर होता है - न ही परिवार के लिए कोई दीर्घकालिक सुरक्षा।

9 बड़ी मांगें: फेयर पे से लेकर पेंशन तक

यूनियनों ने कंपनियों और सरकार के सामने जो माँगें रखी हैं, उनकी जड़ में “सम्मानजनक काम और सुरक्षित भविष्य” की चाह साफ दिखाई देती है। ​ उनकी प्रमुख माँगों में फेयर और ट्रांसपेरेंट पे स्ट्रक्चर (fair and transparent pay structure) लागू करना, 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को खत्म करना, बिना जांच और प्रक्रिया के आईडी ब्लॉक या पेनल्टी रोकना, और कंपनी की ओर से हेलमेट, जैकेट, रेनकोट जैसी सेफ्टी गियर (safety gear) देना शामिल है। ​ साथ ही, वे एल्गोरिदम-बेस्ड भेदभाव खत्म करने, सभी को बराबर काम मिलने, फिक्स्ड ब्रेक (fixed break) और तय सीमा से ज्यादा घंटे काम न लेने, ऐप सपोर्ट और पेमेंट–रूटिंग सिस्टम मजबूत करने की भी मांग कर रहे हैं। सबसे अहम बात, गिग वर्कर्स स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवर और पेंशन जैसी सोशल सिक्योरिटी स्कीम (social security scheme) को कानूनी हक की तरह लागू करने पर ज़ोर दे रहे हैं।

सरकार की भूमिका और नया कानून, लेकिन ज़मीन पर बदलाव कहाँ?

केंद्र सरकार ने सोशल सिक्योरिटी कोड (Social Security Code) के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को एक औपचारिक फ्रेमवर्क में शामिल करने की बात कही है, जिसमें प्लेटफॉर्म कंपनियों से सालाना टर्नओवर का हिस्सा एक सोशल सिक्योरिटी फंड में देने का प्रावधान है। कुछ राज्यों, खासकर तेलंगाना ने गिग वर्कर्स वेलफेयर बिल (Gig Workers Welfare Bill) जैसे कदमों को मंज़ूरी भी दी है। ​ लेकिन यूनियनों का कहना है कि कागज़ पर बने इन प्रावधानों का असर अभी उनके रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई नहीं दे रहा। न जमीन पर मॉनिटरिंग दिखती है, न कंपनियों पर ऐसा दबाव कि वे पे स्ट्रक्चर और सेफ्टी स्टैंडर्ड को पारदर्शी बनाएं।

गिग वर्कर्स कौन और उनकी लड़ाई इतनी अहम क्यों?

ऑनलाइन फूड, किराना और शॉपिंग ऑर्डर के लिए जो लोग स्कूटी या बाइक पर आपके दरवाज़े तक पहुंचते हैं, वही गिग वर्कर्स हैं। ये स्थायी नौकरी (permanent job) की जगह हर डिलीवरी या हर ट्रिप के हिसाब से पेमेंट पाने वाले वर्कर्स हैं जिन्हें किसी कंपनी की “फुल टाइम” कर्मचारी सूची में नहीं गिना जाता। ​ आईटी सर्विस से लेकर टैक्सी, फूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स तक, भारत की नई डिजिटल इकॉनमी इन्हीं गिग वर्कर्स के कंधों पर खड़ी है, लेकिन अधिकार, पेंशन, छुट्टी और सामाजिक सुरक्षा जैसे मामले में ये अब भी पुराने दौर के दिहाड़ी मज़दूरों जैसी असुरक्षा झेल रहे हैं। न्यू ईयर ईव की यह हड़ताल दरअसल उसी असमानता पर सवाल उठाती है कि क्या “इंस्टेंट डिलीवरी” के लिए किसी की जिंदगी और सम्मान हमेशा जोखिम पर लगाए जाएंगे?

​ग्राहकों के लिए चेतावनी और कंपनियों के लिए संदेश

जो लोग 31 दिसंबर की शाम पार्टी के लिए फूड डिलीवरी, केक, ड्रिंक्स या लास्ट मिनट शॉपिंग ऐप्स पर छोड़ने की सोच रहे हैं, उनके लिए यह हड़ताल एक व्यावहारिक चेतावनी है कि उन्हें बैकअप प्लान (backup plan) रखना होगा। देर से डिलीवरी, ऑर्डर कैंसिलेशन और सर्विस आउटेज की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता खासकर बड़े शहरों में, जहां ऑनलाइन ऑर्डर की डिपेंडेंसी सबसे अधिक है। ​ लेकिन यह विरोध सिर्फ ग्राहकों की असुविधा की कहानी नहीं है। यह उन वर्कर्स की आवाज है जो कहना चाहते हैं कि नए साल की रात सिर्फ रेवेन्यू टारगेट (revenue target) और कस्टमर रेटिंग (customer rating) का खेल नहीं, बल्कि उनकी सेहत, सुरक्षा और इज्जत का भी सवाल है। कंपनियां इंसेंटिव और ऑफर्स के ज़रिए इस गुस्से को मैनेज करने की कोशिश कर रही हैं लेकिन यूनियन साफ कह रही हैं कि बिना स्ट्रक्चरल बदलाव (structural change) के अब “लॉग-ऑफ” ही उनका सबसे मजबूत जवाब होगा।

Vews Ai Verified Media or Organization • 27 Feb, 2026 Editor

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